रबड़ — एक भूमध्यरेखीय अखाद्य फसल
रबड़ एक भूमध्यरेखीय (equatorial) फसल है, परंतु विशेष परिस्थितियों में इसे उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी उगाया जाता है। इसे आवश्यकता होती है:
- 200 cm से अधिक वर्षा वाली नम और आर्द्र जलवायु, और
- 25°C से अधिक तापमान।
रबड़ एक महत्वपूर्ण औद्योगिक कच्चा माल है। यह मुख्यतः केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, तथा मेघालय की गारो पहाड़ियों में उगाई जाती है।

आरेख के अंग्रेज़ी लेबलों के हिन्दी अर्थ:
| English (in image) | हिन्दी |
|---|---|
| Fibre and non-food crops | रेशेदार और अखाद्य फ़सलें |
| Cotton - drier black-cotton soil of the Deccan, 210 frost-free days, kharif | कपास - दक्कन की शुष्क काली मृदा, 210 पालारहित दिन, खरीफ़ |
| Jute (the golden fibre) - wet flood-plain soil renewed yearly, West Bengal | जूट (सुनहरा रेशा) - प्रतिवर्ष नवीकृत बाढ़-मैदानी मृदा, पश्चिम बंगाल |
| Rubber - equatorial crop, rainfall above 200 cm, Kerala | रबड़ - विषुवतीय फसल, 200 सेमी से अधिक वर्षा, केरल |
रेशेदार फसलें और कपास
कपास, जूट, सन (hemp) और प्राकृतिक रेशम भारत की चार प्रमुख रेशेदार फसलें हैं। पहली तीन मिट्टी में उगाई जाने वाली फसलों से प्राप्त होती हैं; प्राकृतिक रेशम हरी पत्तियों (विशेषकर शहतूत) पर पाले गए रेशम कीटों के कोकून से प्राप्त होता है। रेशम के लिए रेशम कीटों का पालन रेशम कीट पालन (sericulture) कहलाता है।
कपास: माना जाता है कि भारत कपास के पौधे का मूल घर है, और यह चीन के बाद कपास का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। यह सूती वस्त्र उद्योग का एक मुख्य कच्चा माल है।
- यह दक्कन (Deccan) पठार की काली-कपास मिट्टी के शुष्क भागों में अच्छी तरह उगती है, तथा इसे उच्च तापमान, हल्की वर्षा या सिंचाई, 210 पालारहित दिन और तेज़ धूप की आवश्यकता होती है।
- यह एक खरीफ फसल है जिसे पकने में 6 से 8 महीने लगते हैं। प्रमुख राज्य: महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश।
जूट — सुनहरा रेशा
जूट (सुनहरा रेशा) को 'सुनहरा रेशा' (golden fibre) के नाम से जाना जाता है।
- यह बाढ़ के मैदानों की अच्छी जल-निकास वाली उपजाऊ मिट्टी में अच्छी तरह उगता है जहाँ मिट्टी हर वर्ष नवीनीकृत होती है।
- इसे वृद्धि के समय उच्च तापमान की आवश्यकता होती है।
- प्रमुख उत्पादक राज्य: पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, ओडिशा और मेघालय।
जूट का उपयोग बोरे (gunny bags), चटाइयाँ, रस्सियाँ, धागा, कालीन और अन्य वस्तुएँ बनाने में किया जाता है। तथापि, यह कृत्रिम रेशों और पैकिंग सामग्री, विशेषकर नायलॉन, के कारण अपना बाज़ार खो रहा है।
परीक्षा सुझाव: याद रखें — कपास को शुष्क काली मिट्टी (दक्कन) पसंद है; जूट को गीली, नवीनीकृत बाढ़-मैदान मिट्टी (बंगाल) पसंद है। यह विरोधाभास अक्सर पूछा जाता है।
प्रश्न और उत्तर
प्र1. रबड़ की वृद्धि के लिए आवश्यक भौगोलिक परिस्थितियों और इसके प्रमुख उत्पादक राज्यों को बताइए।
उत्तर: रबड़ एक भूमध्यरेखीय (equatorial) फसल है जिसे 200 cm से अधिक वर्षा वाली नम और आर्द्र जलवायु तथा 25°C से अधिक तापमान की आवश्यकता होती है। एक महत्वपूर्ण औद्योगिक कच्चा माल होने के कारण, यह मुख्यतः केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा मेघालय की गारो पहाड़ियों में उगाई जाती है।
प्र2. जूट को 'सुनहरा रेशा' क्यों कहा जाता है? इसकी उगाने की परिस्थितियों को बताइए।
उत्तर: जूट को इसकी सुनहरी चमक और उच्च मूल्य के कारण 'सुनहरा रेशा' (golden fibre) कहा जाता है। यह बाढ़ के मैदानों की अच्छी जल-निकास वाली उपजाऊ मिट्टी में उगता है जो हर वर्ष नवीनीकृत होती है, और इसे वृद्धि के समय उच्च तापमान की आवश्यकता होती है। यह मुख्यतः पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, ओडिशा और मेघालय में उगाया जाता है।
प्र3. कपास उगाने के लिए आवश्यक परिस्थितियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: कपास दक्कन (Deccan) पठार की काली-कपास मिट्टी के शुष्क भागों में अच्छी तरह उगती है। इसे उच्च तापमान, हल्की वर्षा या सिंचाई, 210 पालारहित दिन और तेज़ धूप की आवश्यकता होती है। यह एक खरीफ फसल है जिसे पकने में 6 से 8 महीने लगते हैं, और भारत चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।
प्र4. रेशम कीट पालन (sericulture) क्या है?
उत्तर: रेशम कीट पालन (sericulture) रेशम रेशे के उत्पादन के लिए रेशम कीटों का पालन है। रेशम कीटों को हरी पत्तियों, विशेषकर शहतूत, पर पाला जाता है, और प्राकृतिक रेशम उनके कोकून से प्राप्त होता है।